Friday, July 19, 2013

023-दर-ख़ुर-ए क़हर-ओ-ग़ज़ब

दर-ख़ुर-ए क़हर-ओ-ग़ज़ब जब कोई हमसा न हुआ
फिर ग़लत क्या है कि, हमसा कोई पैदा न हुआ

बंदगी में भी, वह आज़ाद:-ओ-ख़ुदबीं हैं, कि हम
उलटे फिर आए, दर-ए-का`ब अगर वा न हुआ

सब को मक़बूल है, दा`वा तिरी यकताई का
रूबरू कोई बुत-ए-आईन:-सीमा न हुआ

कम नहीं नाज़िश-ए-हमनामि-ए-चश्म-ए-ख़ूबाँ
तिरा बीमार, बुरा क्या है, गर अच्छा न हुआ

सीने का दाग़ है वह नाल: कि लब तक न गया
ख़ाक का रिज़्क़ है वह क़तर: कि दरिया न हुआ

नाम का मेरे है, जो दुख कि किसी को न मिला
काम में मेरे है, जो फ़ितन: कि बरपा न हुआ

हर बुन-ए-मू से दम-ए-ज़िक्र न टपके ख़ूँनाब
हमज़: का क़िस्स: हुआ, `इश्क़ का चर्चा न हुआ

क़तरे में दजल: दिखाई न दे, और जुज़्व में कुल
खेल लड़कों का हुआ, दीद:-ए-बीना न हुआ

थी ख़बर गर्म कि ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गये थे, प तमाशा न हुआ

-मिर्ज़ा ग़ालिब 

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