Friday, July 19, 2013

022-हवस को है निशात-ए-कार क्या

हवस को है निशात-ए-कार क्या
न हो मरना तो जीने का मज़ा क्या

तजाहुल-पेशगी से मुद्द`आ क्या
कहां तक, अय सरापा-नाज़, क्या, क्या

नवाज़िशहा-ए-बेजा, देखता हूँ
शिकायतहा-ए-रंगी का गिला क्या

निगाह-ए-बे-मुहाबा चाहता हूं
तग़ाफ़ुलहा-ए-तमकीं-आज़मा क्या

फ़रोग़-ए-शो`ल:-ए-ख़स यक नफ़स है
हवस को पास-ए-नामूस-ए-वफ़ा क्या

नफ़स मौज-ए-मुहीत-ए-बेख़ुदी है
तग़ाफ़ुलहा-ए-साक़ी का गिला क्या

दिमाग़-ए-`इत्र-ए पैराहन नहीं है
ग़म-ए-आवारगीहा-ए-सबा क्या

दिल-ए-हर-क़तर: है साज़-ए-अना अल-बहर
हम उस के हैं, हमारा पूछना क्या

मुहाबा क्या है, मैं ज़ामिन, इधर देख
शहीदान-ए-निगह का ख़ूँ-बहा क्या

सुन, अय ग़ारत-गर-ए-जिन्स-ए वफ़ा सुन
शिकस्त-ए-क़ीमत-ए-दिल की सदा क्या

किया किस ने जिगर-दारी का दा`वा
शकेब-ए-ख़ातिर-ए-`आशिक़, भला क्या

यह क़ातिल वा`द:-ए-सब्र-आज़मा क्यों
यह काफ़िर फ़ितन:-ए-ताक़त-रुबा क्या

बला-ए-जां है, ग़ालिब उस की हर बात
`इबारत क्या, इशारत क्या, अदा क्या

-मिर्ज़ा ग़ालिब 

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