Friday, July 19, 2013

020-दोस्त ग़म-ख़्वारी में

दोस्त ग़मख़्वारी में मेरी, स`ई फ़रमावेंगे क्या
ज़ख़्म के भरने तलक, नाख़ुन न बढ़ जावेंगे क्या

बे-नियाज़ी हद से गुज़री, बंद:-परवर कब तलक
हम कहेंगे हाल-ए-दिल, और आप फ़रमावेंगे क्या

हज़रत-ए-नासेह गर आएँ, दीद:-ओ-दिल फर्श-ए-राह
कोई मुझ को यह तो समझा दो, कि समझावेंगे क्या

आज वाँ तेग़-ओ-कफ़न बाँधे हुए जाता हूं मैं
`उज़्र मेरे क़त्ल करने में वह अब लावेंगे क्या

गर किया नासेह ने हम को क़ैद, अच्छा, यूँ सही
यह जुनून-ए-`इश्क़ के अंदाज़ छुट जावेंगे क्या

ख़ान:-ज़ाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यूँ
हैं गिरफ़्तार-ए-वफ़ा, ज़िन्दाँ से घबरावेंगे क्या

है अब इस मा`मूरे में क़हत-ए ग़म-ए-उल्फ़त, असद
हम ने यह माना, कि दिल्ली में रहें, खावेंगे क्या

-मिर्ज़ा ग़ालिब 


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Rahat Fateh Ali Khan/ राहत फ़तेह अली ख़ाँ
https://youtu.be/oB_q9rhstuI




Jagjit Singh/ जगजीत सिंह

https://youtu.be/NrqWsc4qsU8


1 comment:

Smriti Roy said...

beautiful gazal ! with meaning and explanations it is pleasure to read

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